Wednesday, 14 December 2011

imli ka buta

ये जिन्दगी है, इसे झेलने में अchछे अच्छों  के पसीने छुट जाते है. मै ऐसे वक्त में हमेशा गाँव को याद करती हूँ, अपना वो school   याद  आता है ,जो इमली के पेड़ के पास था, यूँ खे स्कुल के पास था इमली का पेड़, जन्हा बीच की छुट्टी में सब ldkinya जाकर इमली खाती थी, मै नही. उस स्कूल की यादें आज  भी भली लगती है,
बेशक आज बड़े स्कुल है, पर गाँव तो अलग है, वंहा भोलापन था, मासुमिअत थी, जो अब नही. आजके बच्चों को भुत झेलना पड़ता है. आजकी माताएं भी बहुत मेहनत करती है, उनके जिम्मे घर के कम भी होते है, बच्चों का होम्वोर्क भी होता है.हम स्कुल की छुट्टी होने के पहले वन्हिपे सब अपनी कविता और phade  गाते गाते थे, जिससे वो सब हमे रट जाता था.
गाँव में अब मिड डे मिल मिलता है, किन्तु pdhai