आज मन नही, कि घर से कागज में लिखकर लायी शायरी को, यंहा ब्लॉग में लिखु . मुक्त होकर लिखने की आदत रही है, मेरी . कल से उधेड़बुन में मन लगा है,सोचकर शानझ से बहुत उद्धिग्न थी, की वंहा उत्तराखंड में , नेपाल के बदमाशों ने वंहा युवतियों को अपनी हवश का शिकार बनाया . क्या शीघ्रता से सहायता नही पंहुचायी जा सकती थि. कंही ये हिन्दुओं के देश में उनकी आपसी फुट का दुष्फल तो नही, यंहा ये देश तन्हा जीता है. हिन्दू कभी भी साथ में नही जीते, वो अलग-थलग ही रहते है, उनकी सहानुभूति नही है, अपने ही समुदाय से .यंही कारन है, की सर्कार ने आपदा प्रबंधन को तेजी से करने की जरुरत नही मानी , चाहते तो, सारे संशाधन झोंक कर वंहा फंसे लोगो को, दो दिन में निकल सकते थे .कमसे कम लडकियों की इज्जत को बचाने के लिए, सारे राज्यों से पुलिस भेज सकते थे. आप ये न कहिये की, तब उन्हें, उनसे कौन बचाता .
ynha, prso, koi dusra hi id dikh raha tha, samajh nhi ata ki, utube v guggle me kaun aaya, sb eksath to nhi sambhl sakta
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