Monday, 24 June 2013

बचपन में आल्हा पढ़ी थी
कुछ पन्तियाँ  है
आप भी देखे , हमारे देश का दर्शन है ये ....

सदा तुरैया न वन फूले , यारों सदा न सावन होय
सदा न माता , उर में जन्मे , यारों समय न बारम्बार
जैसे पात  टूटी तरवर से , गिरी के बहुरि न बारम्बार
मानुष देहि, यह दुर्लभ है , ताते करो , सुयश के काम 

1 comment:

  1. gorakhpur ka alha, tha, jo bua ke ynha se layi thi
    vo, ekaek dimak chat gyi
    ab, jo h, vo asli nhi
    vo varanashi ki kyi kitab h
    mai fir se vnhi, gorakhpur ki alha , dekh rahi hu

    ReplyDelete